नवीन धार्मिक विचारों का उदय

खाली स्थान भरिए
1 महावीर स्वामी का जन्म 540 ई.पू. में हुआ था।
2 महात्मा बुद्ध का जन्म लुम्बिनी नामक स्थान में हुआ था।
3 महात्मा बुद्ध ने अपना पहला उपदेश सारनाथ में दिया था।
4 महात्मा बुद्ध की शिक्षाओं को त्रिपिटक नामक ग्रंथों में संकलित किया गया हैं।
5 सम्यक ज्ञान, सम्यक दर्शन, और सम्यक चरित्र को जैन धर्म में त्रिरत्न महाव्रत कहते हैं।

(ब) प्रश्नों के उत्तर दीजिए
1. स्वामी महावीर का जीवन परिचय लिखिए।
महावीर स्वामी का जन्म 540 ई.पू. में वैषाली के निकट हुआथा । इनके पिता का नाम सिद्धार्थ और माता का नाम त्रिषला देवी था। इनके बचपन का नाम वर्धमान था। 30 वर्ष की उम्र में वर्धमान ने अपने बड़े भाई की आज्ञा प्राप्त कर संन्यास धारण कर कठोर तपस्या की। 12 वर्ष की कठोर तपस्या के बाद उन्हें श्कैवल्यश् अर्थात् सच्चे ज्ञान की प्राप्ति हुई। कठोर तपस्या और सहनशीलता के कारण उन्हें श्महावीरश् कहा गया एवं इन्द्रियों के विजेता होने के कारण उन्हें श्जिनश् भी कहा गया। इसी कारण उनके अनुयायी जैन कहलाते हैं। 72 वर्ष की आयु में पावापुरी नामक स्थान में इनका निर्वाण अर्थात् मृत्यु हुई।

2. जैन धर्म की शिक्षाओं का वर्णन कीजिए ।
उत्तर – जैन धर्म की शिक्षाओं के महत्वपूर्ण पहलू कुछ विचारों पर आधारित है, जो बेहतर शांतिपूर्ण जीवन जीने में मदद कर सकते है। भगवान महावीर स्वामी ने सही विश्वास, उचित आचरण और ज्ञान जैसे विचारों पर जोर दिया है। ये वास्तव में एक व्यक्ति के जीवन को आकार देते है। श्रद्धा बहुत ही व्यक्तिगत है, जब तक यह समझ में नहीं आता है। कि इसे उपयोगी माना जा सकता है, इसे सिखाया या प्रकाशित नहीं किया जा सकता। महावीर स्वामी जी का ईश्वर पर कोई विश्वास नहीं था, लेकिन सभी आत्माओं में एक शक्ति के अस्तित्व में विश्वास था, जो सर्वशक्तिमान है। महावीर भगवान द्वारा प्रचारित पाँच सिद्धान्त निम्न श्हैं

(1) अहिंसा-किसी भी जीवित प्राणी को घायल न करना।

(2) सत्य-सत्य बोलना ।

(3) अस्तेय-चोरी न करना ।

(4) त्याग-संपत्ति का मालिक नहीं ।

(5) ब्रह्मचर्य – सदाचारी जीवन जीने के लिए। जैन धर्म ने मोक्ष प्राप्त करने के तरीकों की सलाह दी है। इस संदर्भ में नौ तत्वों का उल्लेख है। जैव धर्म की शिक्षाओं का भारतीय जनसंख्या पर धर्म, संस्कृति, भाषा, व्यंजन पर व्यापक प्रभाव है।

3. महात्मा गौतम बुद्ध का जीवन परिचय लिखिए ।
उत्तर – बौद्ध धर्म के संस्थापक महात्मा बुद्ध का जन्म 563 ई. पू. कपिलवस्तु के पास लुम्बिनी नामक स्थान में हुआ था। इनके बचपन का नाम सिद्धार्थ था । गौतम बुद्ध के पिता का नाम शुद्धोधन तथा माता का नाम मायादेवी था। कहा जाता है कि उन्होंने जरा, व्याधि और मृत्यु के रहस्य को जानने के लिए 29 वर्ष की आयु में संन्यास ग्रहण कर लिया। छः वर्षों तक कठोर तपस्या के बाद उन्हें सत्य का ज्ञान (सम्बोधि) पीपल वृक्ष के नीचे बोधगया में हुआ था। महात्मा बुद्ध ने अपना पहला उपदेश सारनाथ में दिया। 80 वर्ष की आयु में कुशीनगर में उनको निर्वाण प्राप्त हुआ।

4. बौद्ध धर्म की शिक्षाओं का वर्णन कीजिए ।
उत्तर- महात्मा गौतम बुद्ध ने अपने अनुयायियों को निम्न उपदेश दिया-बौद्ध धम्र के अनुसार चार आर्य सत्य को हमेशा याद रखना चाहिए।

ये हैं- (1) संसार में दुःख है,

(2) दुःख का कारण तृष्णा है,

(3) तृष्णा को त्यागकर दुःख से छुटकारा पाया जा सकता है,

(4) सभी आचरण और सभी बातों में मध्यम मार्ग अपनाकर दुःख पर विजय निर्वाण) प्राप्त किया जा सकता है।

अष्टांगिक मार्ग का पालन करने से दुःख दूर हो सकते हैं,

ये मार्ग – (1) शुद्ध विचार, (2) शुद्ध संकल्प, (3) शुद्ध वाणी, (4) शुद्ध व्यवहार, 5) शुद्ध जीवन, (6) शुद्ध उपाय, (7) शुद्ध ध्यान, (8) शुद्ध उपाधि ।

इसके अतिरिक्त मानव को पाँच नैतिक नियम अपनाने चाहिए-(1) किसी प्राणी की हत्या नहीं करना, (2) चोरी नहीं करना, (3) झूठ नहीं बोलना, (4) मादक द्रव्यों का सेवन नहीं करना, (5) व्यभिचार नहीं करना।

महात्मा बुद्ध ने अपने अनुयायियों को बीच का मार्ग अपनाने को कहा है अर्थात् न अधिक तप और न अधिक भोग-विलास में लिप्त ऽ रहना। बौद्ध धर्म के अनुसार मनुष्य स्वयं अपने भाग्य का निर्माता है। बौद्ध धर्म ने जात-पात, ऊँच-नीच के भेदभाव तथा धार्मिक जटिलताओं को गलत बताया है।

(स) संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए
1 त्रिरत्न 2 चार आर्य सत्य 3 पंचमहाव्रत 4 आष्टांगिक मार्ग
(स) संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए

उत्तर-

1. त्रिरत्न – त्रिरत्नों का जैन धर्म में विशेष महत्व है। ये निम्न हैं-

(1) सम्यक् ज्ञान – सत्य और असत्य का ज्ञान होना ।

(2) सम्यक् दर्शन – सच्चा ज्ञान।

(3) सम्यक् चरित्र- अच्छा कार्य करना

और गलत कार्य त्यागना ।
चार आर्य सत्य – बौद्ध धर्म के अनुसार चार मुख्य सच्चाइयों (चार आर्य सत्य) को हमेशा याद रखना चाहिए। ये हैं

(1) संसार में दुःख है (दुःख का सत्य)।

(2) दुःख का प्रमुख कारण तृष्णा (तीव्र इच्छा) है।

(3) तृष्णा को त्यागकर दुःख से छुटकारा पाया जा सकता है।

(5) सही आचरण एवं सभी बातों में मध्यम मार्ग अपनाकर दुःख पर विजय (निर्वाण) पाई जा सकती हैं।

पंचमहाव्रत-त्रिरत्नों के प्राप्त करने के लिए जिन पाँच महाव्रतों का पालन करना जरूरी था, वे थे
(1) सत्य-सदा सत्य बोलना ।

(2) अहिंसा-मन, वचन एवं कर्म से हिंसा न करना ।

(3) अस्तेय-चोरी न करना ।

(4) अपरिग्रह-धन का संग्रह न करना ।

(5) ब्रह्मचर्य -अपनी इन्द्रियों को वश में करना ।

अष्टांगिक मार्ग– बौद्ध धर्म की शिक्षाओं में अष्टांगिक मार्ग का उल्लेख आता है। अष्टांगिक मार्ग का पालन करने से दुःख दूर हो सकते हैं

ये मार्ग हैं- 1. शुद्ध विचार, 2. शुद्ध संकल्प, 3. शुद्ध वाणी, 4. शुद्ध व्यवहार, 5. शुद्ध जीवन, 6. शुद्ध उपाय, 7. शुद्ध ध्यान, 8. शुद्ध 7 उपाधि। इसके अतिरिक्त मानव को पाँच नैतिक नियम अपनाने चाहिए 1. किसी प्राणी की हत्या नहीं करना, 2. चोरी नहीं करना, 3. झूठ ) बोलना, 4. मादक द्रव्यों का सेवन नहीं करना, 5. व्यभिचार नहीं करना। नहीं

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