जौहर और साका क्या है?

चित्तौड़ जला, पर हार न मानी,
राख में भी थी स्वतंत्र कहानी।
भले ही सिर कट जाए, लेकिन कभी हार मानकर झुको नहीं
यही राजपूतों का उसूल था, यही उनकी जीवन शैली थी।

ये दो पंक्तियां राजपूतों के उस रीति या प्रथा का बताती हैं जिसके तहत राजपूत मध्यकाल में अपने सम्मान की खातिर जान देना बेहतर समझते थे । जब युद्ध या किसी विषम परिस्थति में राजपूत महिलाओं के सम्मान की बात होती थी तो वे जौहर करके अपना जीवन समाप्त कर लेती थी। उसी तरह पुरूष साका के जरिए अपनी जान देना बेहतर समझते थे।
जौहर क्या था?
जौहर राजपूत महिलाओं द्वारा लिया गया एक सामूहिक फैसला था जब किसी लड़ाई में दुश्मन से हार तय था । तो वे सामूहिक रूप से आत्मदाह कर लेती थी । जिसे वे स्वेच्छा और प्रसन्नता से करती थी।
मध्ययुगीन युद्धों में, हारे हुए राज्यों की महिलाओं और बच्चों को पकड़ना आम बात थी। दुश्मनों के हाथों में पड़ने की बजाय जान न्यौच्छावर करना बेहतर होता था।
ऐसी परिस्थितियों में, जौहर को अपमान, जबरन कैद, या सामाजिक पहचान खोने से बचने के लिए एक दुखद लेकिन जानबूझकर उठाया गया कदम माना जाता था।
इसे इस तरह भी समझ सकते हैं कि जौहर रोज़ाना की प्रथा नहीं थी। यह केवल बहुत ज्यादा संकट के समय होता था, आमतौर पर लंबी घेराबंदी के दौरान जब हार टाली नहीं जा सकती थी।
इतिहासकार सतीश चंद्र के अनुसार जौहर को घेराबंदी की लड़ाई के लिए ऐतिहासिक रूप से मजबूर प्रतिक्रिया के तौर पर देखा जाना चाहिए, जहाँ आम लोगों खासकर महिलाओं के पास कोई सुरक्षा नहीं थी।
इसी तरह, रोमिला थापर जौहर को सामंती पितृसत्ता का नतीजा मानती हैं, जहाँ महिलाओं का सम्मान परिवार के सम्मान से जुड़ा हुआ था। उनके अनुसार, यह प्रथा महिलाओं के सशक्तिकरण के बजाय, उनके लिए उपलब्ध सामाजिक विकल्पों की कमी को दिखाती है।

साका आखिरी लड़ाई
साका जौहर के बाद होता था और इसमें राजपूत पुरुष दुश्मन के खिलाफ आखिरी, जानलेवा लड़ाई के लिए तैयार होते थे। वे तभी साका करते थे जब लौटना संभव नहीं था । वे दुश्मन की कैद में आने की बजाय लड़कर जान देना पसंद करते थे। इस दौरान राजपूत पुरूष बलिदान का प्रतीक केसरिया रंग के कपड़े दुश्मन से आखिरी लड़ाई लड़ते हुए अपनी जान गंवा देते थे। इतिहासकार जदुनाथ सरकार ने साका को एक हताश फिर भी पक्का कदम बताया, जो हार पक्की होने पर भी हार न मानने का प्रतीक था।
हालांकि, जदुनाथ के अनुसार बार-बार साका होने से राजपूत राज्य कमजोर हो गए, क्योंकि योद्धाओं की पूरी पीढ़ियां एक साथ खत्म हो गईं, जिससे लंबे समय तक मुकाबला करना मुश्किल हो गया।
ये परंपराएँ धार्मिक विश्वास का नतीजा नहीं थीं, बल्कि मध्यकालीन युद्ध की कठोर सच्चाइयों की प्रतिक्रिया थीं।
मेवाड़ पर मुख्य रूप से सिसोदिया राजपूतों का राज था, जो इन चीज़ों को महत्व देते थे
सम्मान (मर्यादा)
साहस (वीरता)
अपने वंश और ज़मीन के प्रति वफ़ादारी
दबाव का विरोध
इतिहासकार आर.सी. मजूमदार ने माना कि मेवाड़ के राजपूतों में सम्मान और आज़ादी की असाधारण भावना थी, लेकिन उन्होंने यह भी कहा कि यह सम्मान के नियम बहुत सख्त और अटल थे।
चित्तौड़गढ़ में जौहर और साका कब और किन लड़ाईयों में हुए
मेवाड़ की राजधानी चित्तौड़गढ़ के किले ने तीन बड़े मौकों पर जौहर और साका देखा
अलाउद्दीन खिलजी की घेराबंदी के दौरान (1303)
गुजरात के बहादुर शाह के हमले के दौरान (1535)
अकबर की घेराबंदी के दौरान (1568)
हर घटना एक ऐसा पल दिखाती है जब हार मानने के बजाय राजपूतों ने विरोध को चुना गया, भले ही इससे लोगों को नुकसान पहुँचा
इतिहासकार इरफान हबीब इन घटनाओं को सामंती विरोध की सीमाओं के प्रतीक के रूप में देखते हैं,
आधुनिक ऐतिहासिक मूल्यांकन
आधुनिक इतिहासकार मोटे तौर पर तीन बातों पर सहमत हैंरू
जौहर और साका धार्मिक अनुष्ठान नहीं थे, बल्कि युद्ध से बनी सामाजिक प्रथाएँ थीं।
उन्हें महिमामंडन के बजाय सहानुभूति और आलोचनात्मक जागरूकता के साथ समझा जाना चाहिए।
वे सम्मान पर आधारित मध्ययुगीन समाजों में निहित वीरता और त्रासदी दोनों को दर्शाते हैं।
सतीश चंद्र इस दृष्टिकोण को यह कहकर सारांशित करते हैं कि राजपूत प्रतिरोध सम्मान का हकदार है, ऐसी परंपराओं की मानवीय कीमत को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *