विजय नगर साम्राज्य का इतिहास

भारत के इतिहास में विजयनगर साम्राज्य एक ऐसे युग का प्रतिनिधित्व करता है, जब दक्षिण भारत ने राजनीतिक स्थिरता, सांस्कृतिक समृद्धि और स्थापत्य वैभव की नई ऊँचाइयों को छुआ। हंपी के इतिहास, विजयनगर की स्थापना, प्रमुख शासकों, कला‑संस्कृति और पतन की विस्तृत जानकारी जानने के लिए अंत तक जरूर पढ़िए। तुंगभद्रा नदी के तट पर बसा यह महान साम्राज्य न केवल एक शक्तिशाली राज्य था, बल्कि भारतीय सभ्यता और संस्कृति का मजबूत स्तंभ भी रहा।
विजयनगर की स्थापना
विजयनगर साम्राज्य की स्थापना 1336 ईस्वी में हरिहर प्रथम और बुक्का राय प्रथम ने की थी। ये दोनों भाई संगम वंश से संबंधित थे और उन्हें महान संत विद्यारण्य स्वामी का मार्गदर्शन प्राप्त था। उस समय दक्षिण भारत बार-बार होने वाले विदेशी आक्रमणों और राजनीतिक अस्थिरता से जूझ रहा था। विजयनगर की स्थापना का मुख्य उद्देश्य दक्षिण भारत को सुरक्षित करना और हिंदू संस्कृति की रक्षा करना था।
राजधानी विजयनगर (वर्तमान हंपी, कर्नाटक) को रणनीतिक दृष्टि से तुंगभद्रा नदी के किनारे बसाया गया, जिससे यह प्राकृतिक रूप से सुरक्षित नगर बन सका।
विजयनगर के प्रमुख वंश
विजयनगर साम्राज्य का शासन चार प्रमुख वंशों द्वारा किया गयाकृ
1. संगम वंश (1336-1485 ई.) साम्राज्य की नींव रखने वाला वंश।
2. सालुव वंश (1485-1505 ई.) आंतरिक संकट के समय साम्राज्य को संभालने वाला वंश।
3. तुलुव वंश (1505-1570 ई.) विजयनगर का स्वर्ण युग।
4. अरावीडु वंश – तालिकोटा के युद्ध के बाद नाममात्र का शासन। इन सभी में तुलुव वंश का काल सबसे गौरवशाली माना जाता है।
कृष्णदेवराय: विजयनगर का महान शासक
कृष्णदेवराय (1509-1529 ई.) को विजयनगर साम्राज्य का सबसे महान शासक माना जाता है। उनके शासनकाल में साम्राज्य का विस्तार अपने चरम पर पहुँचा। वे न केवल एक वीर योद्धा थे, बल्कि विद्या और कला के महान संरक्षक भी थे।
उन्होंने तेलुगु भाषा में प्रसिद्ध ग्रंथ अमुक्तमाल्यदा की रचना की। उनके दरबार में आठ महान कवि (अष्टदिग्गज) विद्यमान थे। उनके समय में विजयनगर नगर विश्व के सबसे समृद्ध और सुव्यवस्थित नगरों में गिना जाता था।

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प्रशासन और आर्थिक व्यवस्था
विजयनगर का प्रशासन अत्यंत संगठित था। राजा सर्वाेच्च सत्ता का केंद्र होता था, जिसकी सहायता के लिए अमात्य (मंत्री) होते थे। राज्य को मंडलों, नाडुओं और ग्रामों में विभाजित किया गया था। ग्राम स्तर पर स्वशासन की व्यवस्था थी।
कृषि साम्राज्य की अर्थव्यवस्था का आधार थी। सिंचाई के लिए नहरों, तालाबों और बांधों का निर्माण किया गया। व्यापार भी अत्यंत विकसित था। मसाले, सूती वस्त्र और हीरे विदेशों तक निर्यात किए जाते थे। पुर्तगाली, अरब और फारसी व्यापारी विजयनगर से व्यापार करते थे।
कला और स्थापत्य का वैभव
विजयनगर साम्राज्य अपनी भव्य स्थापत्य कला के लिए विश्व प्रसिद्ध है। यहाँ की स्थापत्य शैली में द्रविड़ और इस्लामी कला का सुंदर समन्वय देखने को मिलता है।
हंपी के प्रमुख स्मारकों में विरुपाक्ष मंदिर, विठ्ठल मंदिर का पत्थर रथ, संगीतमय स्तंभ, हज़ारा राम मंदिर और लोटस महल विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। ये स्मारक आज भी विजयनगर की समृद्धि की कहानी कहते हैं।
तालिकोटा का युद्ध और पतन
विजयनगर साम्राज्य के पतन का मुख्य कारण 1565 ईस्वी का तालिकोटा युद्ध था। इस युद्ध में विजयनगर की सेना का सामना दक्कन की संयुक्त सल्तनतोंकृबीजापुर, अहमदनगर, गोलकुंडा, बीदर और बरारकृसे हुआ।
विजयनगर की ओर से अलिया राम राय नेतृत्व कर रहे थे। युद्ध में विश्वासघात और आंतरिक कमजोरियों के कारण विजयनगर की हार हुई। राम राय की हत्या कर दी गई और इसके बाद राजधानी विजयनगर (हंपी) को बेरहमी से लूटकर नष्ट कर दिया गया।
इस युद्ध के बाद विजयनगर साम्राज्य एक शक्तिशाली राजनीतिक सत्ता के रूप में समाप्त हो गया।
ऐतिहासिक महत्व
विजयनगर साम्राज्य दक्षिण भारत का अंतिम महान हिंदू साम्राज्य था। इसने न केवल राजनीतिक सुरक्षा प्रदान की, बल्कि कला, साहित्य, धर्म और स्थापत्य को भी नई दिशा दी। आज भी हंपी के खंडहर उस स्वर्णिम युग की जीवंत स्मृति हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
प्रश्न 1 विजयनगर साम्राज्य की स्थापना कब हुई?
उत्तर 1336 ईस्वी में हरिहर प्रथम और बुक्का राय प्रथम द्वारा।
प्रश्न 2 विजयनगर की राजधानी कहाँ थी?
उत्तर विजयनगर (वर्तमान हंपी, कर्नाटक)।
प्रश्न 3 विजयनगर का स्वर्ण युग किस शासक के समय था?
उत्तर कृष्णदेवराय (1509-1529 ई.) के समय।
प्रश्न 4 विजयनगर का पतन किस युद्ध के बाद हुआ?
उत्तर 1565 ईस्वी के तालिकोटा युद्ध के बाद।

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